Wednesday, September 16, 2009

मैं और मेरे जज़्बात

बादल यहाँ भी थे बरसने ही को;
हम भी भीड़ में तन्हा तन्हा से थे;
पर न हमारी कलम रुसवा थी और न हम;
तभी तो उठाई कलम और कुछ लिखा था;
पढ़े जो हमने खुद के ही लिखे शब्द;
इरादा बदल डाला था बादलों ने;
और हम भी शायद तन्हा न रहे थे;
लिखता ही जा रहा हूँ तब से आज तक;
और अब हमारे बीच कोई तीसरा नहीं ;
बस मैं हूँ और मेरे जज़्बात हैं ;
जो मौके बेमौके कभी कभी,
उतर आते हैं कागजों पर...
Post a Comment