कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है,
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता…
कर पाता बयाँ मैं भी वो अंदर का तूफ़ान,
या तूने ही बस एक दफ़ा "रोक लो" कहा होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
तूने तो देखी सिर्फ़ झूठी मुस्कुराहट मेरी,
मैंने तेरी पलकों का वो मंज़र पढ़ा होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
उलझा रहा मैं ख़ुद के ही बुने जालों में,
काश! तेरी बाहों का सहारा लिया होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
मगर ये हो न सका...
अब आलम ये है कि तू कहीं, मैं कहीं,
बातें तो होती हैं, मगर वो बात नहीं।
पर अब जहाँ हो तुम, खुश हो, ये अच्छा,
मैं भी जी रहा हूँ इधर, ये भी अच्छा...
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।