कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है,
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता…
कर पाता बयाँ मैं भी वो अंदर का तूफ़ान,
या तूने ही बस एक दफ़ा "रोक लो" कहा होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
तूने तो देखी सिर्फ़ झूठी मुस्कुराहट मेरी,
मैंने तेरी पलकों का वो मंज़र पढ़ा होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
उलझा रहा मैं ख़ुद के ही बुने जालों में,
काश! तेरी बाहों का सहारा लिया होता...
उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।
मगर ये हो न सका...
अब आलम ये है कि तू कहीं, मैं कहीं,
बातें तो होती हैं, मगर वो बात नहीं।
पर अब जहाँ हो तुम, खुश हो, ये अच्छा,
मैं भी जी रहा हूँ इधर, ये भी अच्छा...
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।
14 comments:
क्यूँ भाई? क्या हुआ?
किधर चले भाई
छोड़ो रहने दो चुप-चाप डटे रहो अपने काम में
हम समझे अलविदा शीर्षक की कोई भावुक सी कविता लिखे होगे..वही है न!! जरा लगाओ..लगता है पोस्ट होने से रह गई है.
मुझे भी लगता है पोस्ट छूट गई है
ऐसे कैसे अलविदा!?
बी एस पाबला
aise kaise chale jaoge bhai , kuch bata to do aisa thodi na hota hai
are kya huwa assa
कभी अलविदा ना कहना कभी ................!
aa jao bhai main kavita padh ke khisak jaane walon me se hoon aaj mai bhi keh raha hoon .. dont say alvida..
ambuj kahan ho tum ????
ab aa jao...ab to bahut miss karne lage hain tumhein...
didi..
सच्मुच चले गये क्या ?
m still waitin
aa jao yaar
Finally ja rahe he ...!!!
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