Wednesday, September 16, 2015

एक और मुलाक़ात

एक पुरानी डायरी टकरा गयी आज 
पलटा तो मानो वक़्त पलट दिया 
बिखर  बिखर गए थे सफ़हे,
अल्फ़ाज़ मगर सलामत थे सारे

चंद फूल थे, रख लिए हैं सँभाल कर 
कुछ सूखे पत्ते थे जो जला दिए
ये पत्तियाँ जो अब तक हरी हैं,
क्या करूँ इनका, कोई कुछ मशवरा दो 

Tuesday, August 04, 2015

खिड़की खुलती थी जिधर मेरी, एक दीवार बन गयी है,
चाँद को मैं और मुझे अब चाँद नहीं मिलता

ज़माना पूछता रहता है, अब क्यों नहीं लिखते
है कागज़ भी कलम भी, अब कोई मक़सद नहीं दिखता

सबा भी ढूंढने आई सुख़नवर कोई, कह दिया मैंने,
मर गया ग़ालिब, इधर अब कोई नहीं रहता 

Sunday, May 02, 2010

अलविदा

 कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता…


कर पाता बयाँ मैं भी वो अंदर का तूफ़ान, 

या तूने ही बस एक दफ़ा "रोक लो" कहा होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


तूने तो देखी सिर्फ़ झूठी मुस्कुराहट मेरी, 

मैंने तेरी पलकों का वो मंज़र पढ़ा होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


उलझा रहा मैं ख़ुद के ही बुने जालों में, 

काश! तेरी बाहों का सहारा लिया होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


मगर ये हो न सका... 

अब आलम ये है कि तू कहीं, मैं कहीं, 

बातें तो होती हैं, मगर वो बात नहीं।


पर अब जहाँ हो तुम, खुश हो, ये अच्छा, 

मैं भी जी रहा हूँ इधर, ये भी अच्छा... 

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, 

उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।

Thursday, April 15, 2010

कनेक्शन्स कैसे कैसे !!!

सोचने बैठता हूँ तो,
कभी कभी लगता है जैसे,
लगता है जैसे तुमको,
महसूस हो रहा हो वो सब,
वो सब जो मैने सोचा, चाहा,
देखा, सुना या देखना सुनना चाहा...

जबकि मैं ये जानता हूँ कि,
कोई न्यूरल कनेक्शन नहीं,
ना ही कुछ ब्लूटूथ के जैसा है...

फिर भी कभी कभी,
कभी कभी लगता है जैसे,
जैसे ब्रेन के सिवा भी,
और कनेक्शन्स हो सकते हैं...

Wednesday, March 24, 2010

'अपूर्ण'

एक आलमारी भरी हुई,
medals और trophies से,
newspaper की वो cuttings,
है जिनमें ज़िक्र कहीं,
या हमारी कोई तस्वीर,
वो भारी भरकम folder,
certificates से भरा हुआ...

कविताओं और कहानियों से भरी,
वो कितनी सारी diaries,
वो unpublished, incomplete novel,
'उसके' कहने पर जिसे,
'अपूर्ण' ही रहने दिया,
पर bestseller लिख दिया था,
अपनी handwriting में...

जाने अनजाने कितने चेहरे,
 जिनमें हमेशा तलाशा मैंने,
कभी 'उसे' कभी खुद को...

एक दिन सब रह जायेगा,
यहीं, और 'अपूर्ण'.....


ऐसे ही ख़याल कुछ बोये,
बरसों पहले एक डायरी में,
पन्ने कितने हमने खोये,
जिंदगी की इस शायरी में...

प्यास बड़ी है लिखने की,
जितना लिखोगे उतनी बढ़ेगी,
कविता भी है जिंदगी जैसी,
'अपूर्ण' है, 'अपूर्ण' रहेगी...