Thursday, February 11, 2010

हिचकी ने कल रात नींद से जगाया था...

कह दिया था सब कुछ आँखों से,
फिर भी होठों को कंपकंपाया था...

थामना ना थामना थी तेरी मर्ज़ी,
मैने तो अपना हाथ बढ़ाया था...

बुला रही थी या कहा था अलविदा,
देर तक हाथों को हिलाया था...

करता हूँ इंतज़ार रोज ख्वाबों में,
ख्वाब ख्वाबों का तूने दिखाया था...

अब भी याद करती हो क्या मुझको,
हिचकी ने कल रात नींद से जगाया था...
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