Thursday, February 18, 2010

ख्वाब चौखट पे मेरी...

दे पाया ना सबको जहान मुकम्मल,
खुदा ये जहान बनाया क्यों है...

एक पल जी लेने की आस में,
हमने सिफ़र बस पाया क्यों है...

दिल में तो सबके घनघोर अंधेरा,
घर में दीया ये जलाया क्यों है...

दिखता नही अब चेहरा इसमें,
ऐसा आईना लगाया क्यों है...

रिश्ता नींद से कबका टूटा,
ख्वाब चौखट पे मेरी आया क्यों है...
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