Sunday, June 21, 2009

जिंदगी मुझसे यूँ हैरान सी क्यूँ है

क्यूँ परेशान हूँ मैं जिंदगी से और
जिंदगी मुझसे यूँ हैरान सी क्यूँ है

पहुँच गये थे शिखरों पर
फिर हम ऐसे बर्बाद से क्यूँ हैं
अपनी बनाई ही तो थी सब राहें
तो हम यूँ गुमराह से क्यूँ हैं

क्यूँ परेशान हूँ मैं जिंदगी से और
जिंदगी मुझसे यूँ हैरान सी क्यूँ है
भटक रहा किसी के इंतज़ार में पर
जाता हूँ जिधर सुनसान ही क्यूँ है

सुनने को एक आवाज़ तरस रहा हूँ
सारी राहें वीरान सी क्यूँ है
क्यूँ परेशान हूँ मैं जिंदगी से और
जिंदगी मुझसे यूँ हैरान सी क्यूँ है

सबकुछ खोकर है पाया जिसको
वो मंज़िल ही बेकाम सी क्यूँ है
अब तक बस जिसको जाना है मैने
वो मुझसे अंजान सी क्यूँ है

क्यूँ परेशान हूँ मैं जिंदगी से और
जिंदगी मुझसे यूँ हैरान सी क्यूँ है
Post a Comment