Sunday, December 13, 2009

जिंदगी का सफ़र...

याद है,
वो पहली मंजिल,
जहाँ सचेत किया था,
रास्ते ने मुझे,
के मुसाफिर,
थमना नहीं,
कई मुकाम बाकी है,
जीतने के लिए,
मुकम्मल जहान बाकी है...
चाँद सूरज गिने तो क्या,
तारों से भरा,
ये आसमान बाकी है...

फिर क्या,
चलते ही जा रहे,
उस राह पर हम,
जिसपर कोई भी,
आखिरी मंजिल नहीं...
हैं तो बस चंद पड़ाव,
रास्ता बताते हुए,
अगले पड़ाव का...
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