Sunday, May 02, 2010

अलविदा

 कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता…


कर पाता बयाँ मैं भी वो अंदर का तूफ़ान, 

या तूने ही बस एक दफ़ा "रोक लो" कहा होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


तूने तो देखी सिर्फ़ झूठी मुस्कुराहट मेरी, 

मैंने तेरी पलकों का वो मंज़र पढ़ा होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


उलझा रहा मैं ख़ुद के ही बुने जालों में, 

काश! तेरी बाहों का सहारा लिया होता... 

उस रोज़ एयरपोर्ट पर अलविदा न किया होता।


मगर ये हो न सका... 

अब आलम ये है कि तू कहीं, मैं कहीं, 

बातें तो होती हैं, मगर वो बात नहीं।


पर अब जहाँ हो तुम, खुश हो, ये अच्छा, 

मैं भी जी रहा हूँ इधर, ये भी अच्छा... 

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, 

उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।

Thursday, April 15, 2010

कनेक्शन्स कैसे कैसे !!!

सोचने बैठता हूँ तो,
कभी कभी लगता है जैसे,
लगता है जैसे तुमको,
महसूस हो रहा हो वो सब,
वो सब जो मैने सोचा, चाहा,
देखा, सुना या देखना सुनना चाहा...

जबकि मैं ये जानता हूँ कि,
कोई न्यूरल कनेक्शन नहीं,
ना ही कुछ ब्लूटूथ के जैसा है...

फिर भी कभी कभी,
कभी कभी लगता है जैसे,
जैसे ब्रेन के सिवा भी,
और कनेक्शन्स हो सकते हैं...

Wednesday, March 24, 2010

'अपूर्ण'

एक आलमारी भरी हुई,
medals और trophies से,
newspaper की वो cuttings,
है जिनमें ज़िक्र कहीं,
या हमारी कोई तस्वीर,
वो भारी भरकम folder,
certificates से भरा हुआ...

कविताओं और कहानियों से भरी,
वो कितनी सारी diaries,
वो unpublished, incomplete novel,
'उसके' कहने पर जिसे,
'अपूर्ण' ही रहने दिया,
पर bestseller लिख दिया था,
अपनी handwriting में...

जाने अनजाने कितने चेहरे,
 जिनमें हमेशा तलाशा मैंने,
कभी 'उसे' कभी खुद को...

एक दिन सब रह जायेगा,
यहीं, और 'अपूर्ण'.....


ऐसे ही ख़याल कुछ बोये,
बरसों पहले एक डायरी में,
पन्ने कितने हमने खोये,
जिंदगी की इस शायरी में...

प्यास बड़ी है लिखने की,
जितना लिखोगे उतनी बढ़ेगी,
कविता भी है जिंदगी जैसी,
'अपूर्ण' है, 'अपूर्ण' रहेगी...

Monday, March 08, 2010

दुबारा कब आओगे...

हवा का एक तेज झोंका,
आया था मुझसे मिलने,
कमरे की खिड़की आधी खोल गया...

कुछ खास था इस झोंके में,
हर झोंका नहीं आता मुझ तक,
खिड़की खोलकर, कुछ कहने...
हर झोंका लेकर नहीं आता,
एक खास खुशबू साथ अपने,
काँच पर खिड़की के मेरे,
लिखकर नहीं जाता हर झोंका...
कुछ खास तो था ये झोंका...

जाने क्यों, लगा जैसे,
लगा जैसे, तुम आये थे,
और छूकर चले गये...

खिड़की खुली है तभी से,
और नज़रें हैं कि,
नाम नहीं लेतीं हटने का,
उस अधखुली खिड़की से...
कान बैठे हैं ध्यान लगाये,
हो कोई तो आहट,
जो दे संदेशा आन्धी का...
और होठों पर एक ही सवाल,
दुबारा कब आओगे...

Saturday, February 27, 2010

काश...

काश कुछ लम्हे ज़िंदगी के,
हो पाते Shift+Delete,
Text messages की तरह…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि रियल लाइफ में भी,
अच्छी लगती sad stories,
गीतों ग़ज़लों की तरह…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

आसमान में टूटा चाँद देखकर,
आया दिल में एक नेक ख़याल,
काश कि होता कोई product "FeviMoon"…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

सबको मिलता है trial version,
काश होता full version ज़िंदगी का,
और हम fake license key बना पाते…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

होता कोई option ज़िंदगी में,
format या system clean-up का,
काश हमें unlimited memory ना मिलती…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि पसंद ना आने पर,
कोई update ज़िंदगी का कर पाते,
uninstall या फिर system restore…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि एक ही click में,
हो जाते autocorrect,
ज़िंदगी के सारे syntax errors…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

ग़लतियाँ करके भी मिटा पाते,
काश कि ज़िंदगी के canvas में,
कोई eraser, कोई undo होता…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि होता कोई conservative field,
और हो पाती ज़िंदगी में भी,
कुछ reversible processes…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि minimize हो पाते,
Unwanted variations ज़िंदगी के,
किसी low, high या band fielter से…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि कम कर पाता,
ज़िंदगी की vibrations को,
कोई proper isolation system…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश ना आता कोई obstacle,
flow को turbulent बनाने,
या उसे neglect कर पाते…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

काश कि पता होते हमें,
हर outcome के required events,
और हो पाती reverse engineering…

मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगी

कितनी आसान हो जाती ज़िंदगी,
बिल्कुल engineering की तरह,
पता जो हमें sorce code होता…

काश कि engineering की तरह
इतनी आसान हो पाती ज़िंदगी,
या फिर हम engineering student ना होते...

Thursday, February 18, 2010

ख्वाब चौखट पे मेरी...

दे पाया ना सबको जहान मुकम्मल,
खुदा ये जहान बनाया क्यों है...

एक पल जी लेने की आस में,
हमने सिफ़र बस पाया क्यों है...

दिल में तो सबके घनघोर अंधेरा,
घर में दीया ये जलाया क्यों है...

दिखता नही अब चेहरा इसमें,
ऐसा आईना लगाया क्यों है...

रिश्ता नींद से कबका टूटा,
ख्वाब चौखट पे मेरी आया क्यों है...

Thursday, February 11, 2010

हिचकी ने कल रात नींद से जगाया था...

कह दिया था सब कुछ आँखों से,
फिर भी होठों को कंपकंपाया था...

थामना ना थामना थी तेरी मर्ज़ी,
मैने तो अपना हाथ बढ़ाया था...

बुला रही थी या कहा था अलविदा,
देर तक हाथों को हिलाया था...

करता हूँ इंतज़ार रोज ख्वाबों में,
ख्वाब ख्वाबों का तूने दिखाया था...

अब भी याद करती हो क्या मुझको,
हिचकी ने कल रात नींद से जगाया था...

Monday, January 25, 2010

चोरी तो हुई है

चोरी तो हुई है...
कमरा कुछ खाली खाली सा है.
झांक कर देखा तो सब कुछ,
लग रहा है पहले जैसा ही,
पर कुछ तो जरुर हुआ है गायब,
तभी तो खाली खाली सा है.
चोरी तो हुई है...