Sunday, November 01, 2009

जगह नहीं आंसू के लिए...


साथ देती ही क्यों हो,
पल दो पल का मुझे,
ख़्वाबों में कभी कभी,
देने मुझे आंसुओं का साथ,
क़यामत तक के लिए...

समंदर रेत को हमने,
है आंसुओं से कर दिया,
आओ कभी जिंदगी में भी,
निकल कर ख़्वाबों से,
तुम भी देखने के लिए...

आंसू की एक बूँद से पूछा,
क्यों निकले आँखों से बाहर,
नाम लिया था उसने तेरा,
रहती हो तुम आँखों में जो,
जगह नहीं आंसू के लिए...

मरते ही रहते हैं हर पल,
जीते हैं बस ख़्वाबों में ही,
काश कि रह पाते,
ख़्वाबों में ही हम,
उमर भर के लिए...


(The lines written over the picture aren't mine.)
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