Thursday, November 19, 2009

'१० जनपथ' में 'जनता' ढूंढ़ रहा हूँ!!!

भूखे तुम, हम ऐश कर रहे
लोकतंत्र की जय जयकार,

आखिर तुमने हमें "चुना" है...
***
२ 
छुट्टियाँ खराब करके बनाया, 
एक सांचा उपर वाले ने, 

और तुझे बनाकर उसे तोड़ दिया...
***
३ 
बेशक बहुत मेहनत का, 
होता होगा खुदा का काम, 

तुझे देखकर यकीन हो आया है...
***
४ 
जनतन्त्र में, सुना था 
जनता का शासन होता है, 

शासन शोषण का फ़र्क खोज रहा हूँ...

(पहले ऐसा लिखा था:
५ 
जनतन्त्र में, सुना था 
जनता का शासन होता है, 

'१० जनपथ' में 'जनता' ढूंढ़ रहा हूँ!!!)

13 comments:

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना। बधाई।

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

(पहले ऐसा लिखा था:५ जनतन्त्र में, सुना था जनता का शासन होता है,
'१० जनपथ' में 'जनता' ढूंढ़ रहा हूँ!!!)


kataaksh ke saath bahut hi sunder aur behtareen rachna........

दीपक 'मशाल' said...

कमाल की त्रिवेणी... अम्बुज
इसी बात पे सुनो.. ''चटका लगा दिया हमने.. जलवा दिखा दिया तुमने.. तारा..''
:) जय हिंद...

अनिल कान्त said...

कमाल की त्रिवेणी

Mithilesh dubey said...

सच में बेहतरीन ।

Anshu Mali Rastogi said...

मित्र, दस जनपथ कोई जनता के लिए थोड़े ही है जो वहां जनता को ढूंढने निकले हो। वहां केवल नेता ही मिलते-दिखते हैं।

Pawan Kumar said...

बेशक बहुत मेहनत का,
होता होगा खुदा का काम,


तुझे देखकर यकीन हो आया है...

इस उम्र में ये तेवर.........बहुत ही अच्छे..! अच्छा लिकते रहिये हमारी शुभकामनाये

Pratik Maheshwari said...

राजनीति की पोल-खोल..
अंतिम पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर और सच्ची..

बधाई..
प्रतीक माहेश्वरी

शिवम् मिश्रा said...

बहुत बढ़िया ......लगे रहो !

Niraj said...

sahi...politics pe bhi likhna suru kar diya..!!

अपूर्व said...

'१० जनपथ' में 'जनता' ढूंढ़ रहा हूँ!!!

दस जनपथ एक सत्ता-समुद्र है जहाँ पहुँच कर जनता भी जनता नही रहती...

अच्छा लिख रहे हो आप..

गौतम राजऋषि said...

अच्छा लिखा है अम्बुज....बहुत अच्छा।

और तुम्हारी मैथिली ने चौंका दिया।
:-)

प्रिया said...

waah Trevani......gulzaar saab ke haath se nikal aap tak pahuchi.....bahut solid kamaal