Wednesday, October 14, 2009

पनाहों में तेरी हम, एक ठिकाना चाहते हैं...

चमन के फूल भी,
तेरी तारीफ में खिलते हैं, 
मैं ही नही कहता ये, 
यहाँ सब लोग कहते हैं...  

तासीर इस हुस्न की ऐसी 
सब को है तसव्वुर तेरा, 
खोए तेरे ही ख़याल में, 
सब दिन रात रहते हैं...  

मैं ही नही कहता ये, 
यहाँ सब लोग कहते हैं...  

तारीफ में तेरी जो चाँद, 
अपने तरानो में कहा, 
तेरे हुस्न की तौहीन इसे, 
मेरे जज़्बात कहते हैं...  

मैं ही नही कहता ये, 
यहाँ सब लोग कहते हैं...  

हुस्न और हिज़ाक़त के, 
मेल ऐसे ना देखे हमने, 
मुकम्मल जहाँ में बस, 
एक आप ऐसे रहते हैं...  

मैं ही नही कहता ये, 
यहाँ सब लोग कहते हैं...  

परस्तिश करें तेरी, 
कहती हैं ख्वाहिशें, 
खुदा तुमको बनाने का,
एक बहाना चाहते हैं...

ये सब नही कहते होंगे, 
बस हम ही कहते हैं...
अब तो चाहत नहीं,
इसके सिवा कुछ भी,
पनाहों में तेरी हम, 
एक ठिकाना चाहते हैं...  
ये सब नही कहते होंगे, 
बस हम ही कहते हैं...
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