Monday, October 19, 2009

तुम अब भी क्यों हो...

तब जबकि तुम थे,
सिर्फ तुम ही थे,
पर तुम अब भी क्यों हो,
जबकि तुम तो चले गए...

सफलता के आसमां पर आकर,
याद आ रहे हैं वो रेत जिससे,
ज़मीं पर हमने खेला है...

सफ़र था तो हमसफ़र थे,
ऊफ़्फ़, ये जीतने की ललक!!
मंजिल पे दिल अकेला है...

सोचते थे नीचे से देखकर,
क्या होगा उस शिखर पर?
कुछ नहीं, ग़म-ए-तन्हाई है...

पीछा ही करते रह गए हम,
जिंदगी का जिंदगी भर, और अब
बस यादों की परछाई है...

(और अंत में, रुस्तम सहगल जी की पंक्तियाँ:
क्या खबर थी, इस तरह से वो जुदा हो जायेगा,
ख्वाब में भी उसका मिलना, ख्वाब ही बन जायेगा...)
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