Sunday, October 25, 2009

ग्रामीण विद्यालय

काश वहां "विकास" न होता,
जहाँ हम पढ़ा करते थे,
पीपल के इक पेड़ तले...

विद्या और विद्यालय दोनों,
ख़ाक हो गए थे फिर जलके,
उस जलते पीपल के तले...
                                                                               
शिक्षक भी घर बैठे बैठे,
"निस्वार्थ" हैं देने लगे ट्यूशन,
उनका धंधा भी फुले फले...

आसमान पर प्राइवेट कोचिंग,
कागजों पर हैं विद्यालय,
अफसरशाही की छांव तले...

गाँव में शिक्षा की ये हालत,
रह न गयी अब देखने लायक,
लो, अम्बुज भी शहर चले...
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