Sunday, October 18, 2009

फिर रंग दे बसंती...

अत्याचार बढा था हमपर,
बना था बोझ अंग्रेजी शाषण,
अपने ही घर में अपमानित,
हमने कहा था रंग दे बसंती...

साठ साल अपना राज,
पिछड़े के पिछड़े हैं रहे हम,
भरता जा रहा स्विस बैंक,
अब न कहें क्यों, रंग दे बसंती...

गाँधी की खादी को पहन कर,
गाँधी छपा नोट हैं लेते,
देश बेच दें पैसों खातिर,
अब न कहें क्यों, रंग दे बसंती...

क्यों न हो आतंकी हमले,
जब राज कर रहे बड़े आतंकी,
भ्रष्ट हो गए हैं सारे दल,
अब न कहें क्यों, रंग दे बसंती...

महंगाई चरम पर पहुंची,
भूखी मरे गरीब जनता,
ऐश कर रहा है जब राजा,
अब न कहें क्यों, रंग दे बसंती...

आज जरुरत आन पड़ी है,
करते हैं हम ये आह्वान,
फिर से कोई भगत सिंह आये,
कहने को, फिर रंग दे बसंती...
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